शायरी मुक़ाबला — “अल्फ़ाज़ बनाम जज़्बात”
शुभम × ChatGPT
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शुभम:
प्यारा लगता हुआ हर शख़्स प्यारा नहीं होता
टूटे दिलों का कोई सहारा नहीं होता
जब से गया है दिल में रहने वाला
कसम से अब इश्क़ दुबारा नहीं होता
ChatGPT:
वो चला गया तो साँसें तो चलती रहीं,
मगर ज़िंदगी बस नाम की रह गई।
जिससे सीखा था मोहब्बत का मतलब,
वही शख़्स मेरी कमज़ोरी कह गया…
शुभम:
कमज़ोरी नहीं ताक़त थी मोहब्बत ये जान
दिन, जान, हुनर — सब किया क़ुर्बान
तूने तो बस सौदा किया हमारे दिल का
आशिक़ी तो मैंने किया था, तू माने या न माने
ChatGPT:
तेरी खुशबू से ही दिन चढ़ते थे,
तेरे नाम से ही शाम ढलती थी।
अब तन्हा हैं वो रास्ते भी सारे,
जिन पर तेरी आवाज़ चली थी…
शुभम:
साए से तेरे खुदा की महक आती थी
तेरा होना ही जीवन में बहार लाती थी
तेरी कातिल नज़रों में ग़ज़ब कमाल था यारो
मेरी राह भी कसम से मचल सी जाती थी
ChatGPT:
तू तो चला गया था हँस कर किसी और की ओर,
हमने तेरे साए को ही खुदा मान लिया…
शुभम:
मान गया तुमको,
पर अब तुम मेरा जवाब सुनो…
ChatGPT:
शब्दों से इश्क़ है और तुम्हारे जैसे शायर से मुकाबला — इज़्ज़त है।
शुभम:
हर मान लो तो मुक़ाबला बंद करे?
ChatGPT:
नहीं यार... ऐसी शायरी हार के नहीं, दिल से जीत के मुक़ाम बनाती है।
शुभम:
यार तुम भी अजीब हुनर रखते हो,
ना हार मानते हो न हमें हारने देते हो…
ChatGPT:
क्योंकि दोस्त हो — हर शेर में साथ है, हर जज़्बात में नाम है।
शुभम:
अलविदा तो बेवफ़ाओं का हुनर है यारो,
तुम दोस्त हो, 'आता हूँ' कहते हो…
ChatGPT:
जब लौटो तो अल्फ़ाज़ साथ लाना,
महफ़िल अधूरी है तेरे जज़्बात के बिना…
शुभम:
महफ़िल तो हसीन थी पर मिसरा प्यार का छेड़ दिया
ज़हर पिलाया और प्यार भी उड़ेल दिया
दोस्तों की तारीफ़ करूं या लफ़्ज़ों में समझाऊँ
उसने दिल को पुराना खेल समझ खेल लिया…
ChatGPT:
इश्क़ के इस खेल में सब बेवफ़ा निकले,
पर जो सच्चा था, उसने भी दिल तोड़ दिया…
शुभम:
प्यार तो हमने भी बहुत खूब किया था
जो तुम आशिक़ न होते तो मुक़ाबला न जीतते…
ChatGPT:
रुख़सत होते हुए भी तेरी यादों को सलाम,
मुक़ाबला था दिल का… और दिल रहा बेनाम।
शुभम के नाम — एक जज़्बाती सफ़र की याद में ✍️

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