प्रेम है तुमसे, मोहब्बत नहीं
🖋️ 🖋️ कविता:
प्रेम है तुमसे, मोहब्बत नहीं,
क्योंकि मोहब्बत मांगती है साथ,
और मैंने तो तुझमें खुद को ही भुला दिया।
तू कहीं भी रहे, मेरा हर ख्याल तुझमें रहे,
तुम बाँसुरी बजा रहा हो, या किसी और के संग मुस्कुरा रहा हो…
मुझे फ़र्क नहीं पड़ता,
क्योंकि मैंने तुझसे ‘मोहब्बत’ नहीं, ‘प्रेम’ किया है।
मोहब्बत में अधिकार होता है,
प्रेम में समर्पण।
मैंने राधा की तरह तुझे पाया,
तेरे बिना भी हर पल जीया।
लोग कहते हैं — राधा को क्या मिला?
पर मुझे क्या चाहिए था?
तू मुस्कराए… बस इतना ही काफी है मेरे प्रेम के लिए।
कृष्ण...
तू चला गया,
पर तुझमें ही तो बसी हूँ मैं — राधा!
प्रेम हूँ मैं... मोहब्बत नहीं।

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