रात कितनी भी गहरी हो,
उजाले को आने से कौन रोक पाया है?
आँखों में आंसुओं की धार हो,
पर मुस्कान ने हर दर्द को धो डाला है।
थक गए हों कदम चलते-चलते,
तो थोड़ा रुक जाना कोई हार नहीं।
हर मोड़ पर ज़िंदगी देती है सबक,
गिरने के बाद संभलना ही तो इनाम है कहीं।
उम्मीदों की लौ जब मंद हो,
तब अंदर की रोशनी को जलाओ।
सपनों की चादर ओढ़कर
खुद से एक नई शुरुआत बनाओ।
हर अंधेरे के बाद उजाला है,
हर हार में छुपी एक नयी दिशा है।
सिर्फ़ चलना है, रुकना नहीं,
क्योंकि सवेरा फिर आएगा... यही आशा है।
✍️ — Awaaz India कवि मंडल
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